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धारावाहिक

किसी की नज़र न लगे


धारावाहिक
सोमवार से शुक्रवार तक दोपहर 01.00 बजे

डीडी नेशनल  (डीडी-1) चैनल 

About the show

किसी की नज़र न लगे

 

दूरदर्शन 7 मई, 2008 से किसी की नज़र न लगे नामक नए दैनिक धारावाहिक का प्रसारण कर रहा है । यह दैनिक धारावाहिक सोमवार से शुक्रवार तक दोपहर 01.00 बजे डीडी नेशनल (डीडी-1) चैनल पर प्रसारित किया जा रहा है । इस धारावाहिक का निर्माण और निर्देशन रजा मुखर्जी द्वारा किया गया है । सुभिराज, अरूप पाल, संजीव सेठ, आशिष कौल, दामिनि कंवल शेट्टी, कशिष दुग्गल, कमालिका गुहा ठाकुरता, कल प्रसाद मुखर्जी, बुद्धादित्य मोहन्ती, शिवानी गोसार्इं, अबीर गोस्वामी, एकता शर्मा, शबनम और विकास आनंद इसमें मुख्य भूमिका में है ।

 

किसी की नज़र न लगे एक भावात्मक और सस्पैंस भरा पारिवारिक नाटक है । इसकी कहानी बनर्जी परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है जो एक संयुक्त परिवार है । परिवार का मुखिया 75 वर्षीय रुद्रप्रसाद बनर्जी है । उसके तीन पुत्र हैं और एक पुत्री भी है जिसका नाम रंजना है । दुर्भाग्य से पुत्री के जन्म के तत्काल बाद उनकी पत्नी का निधन हो जाता है तथा वह अपने बच्चों के पालने की जिम्मेदारी स्वयं पर ही ले लेता है ।

 

रुद्रप्रसाद के बड़े पुत्र राजशेखर ने प्रभावती नामक महिला से शादी कर ली । उनका शुदिप्त नामक एक पुत्र तथा एक पुत्री है जिसका नाम सुष्मिता है । उनका एक आदर्श और सुखी परिवार था । तथापि, भाग्य ने उनका साथ नहीं दिया और राजशेखर की पत्नी की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई लेकिन उसका शव नहीं मिल पाया । उसका और उसके बच्चों का दिल टूट गया । केवल वनशिखा नाम की युवती थी जो एक सहृदय गवर्नेंस थी जिसने उन्हें प्यार और स्नेह से भरी अच्छी जिंदगी जीने की आशा दी । वह उनके डराइवर की पुत्री थी । जब रुद्रप्रसाद को इसका पता चला तो उसने आयु में लगभग 20 वर्ष के अंतर को भी अनदेखा करते हुए वनशिखा की अपने पुत्र से शादी का निर्णय लिया । वनशिखा का पिता बैनर्जी परिवार का कर्जदार था और इसलिए वह इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से मना नहीं कर   सका । तथापि, वनशिखा और रुद्रप्रसाद के सबसे छोटे पुत्र अनिरुद्ध के बीच पनपे सहज प्यार के बारे में किसी को पता नहीं था । एक आज्ञाकारी पुत्री होने के नाते वनशिखा ने राजशेखर से चुपचाप शादी कर ली तथा अपनी इच्छाओं को मार लिया । दूसरी तरफ अनिरुद्ध ने अविवाहित ही रहने का निर्णय ले लिया क्योंकि उसके दिल में वनशिखा के अलावा किसी और के लिए जगह नहीं थी । केवल एक बार नशे की हालत में वह उसके साथ सो गया था जिसके फलस्वरूप एक बेटी पैदा हो गई जिसका नाम रंजना  था । तथापि, उसने उस लड़की को पिता का प्यार और सहारा नहीं  दिया । वनशिखा अपनी बच्ची से अत्यधिक प्यार करती थी लेकिन अपनी बेटी को पक्षपात के कलंक से बचाने के लिए उसने उसे एक बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया तथा अपने आपको शुदिप्त और सुष्मिता के प्रति समर्पित कर दिया । तथापि, उसका समस्त त्याग बेकार गया क्योंकि न तो शुदिप्त और न ही सुष्मिता उसके सहज प्यार और समर्पण के लिए वनशिखा के कृतज्ञ थे ।

 

       वास्तव में उन्होंने उसे अपनी मां के रूप में कभी स्वीकार नहीं किया । रक्तिमा भी वनशिखा से घृणा करती थी क्योंकि रक्तिमा यह समझती थी कि उसकी मां ने उसे त्याग दिया है । इस प्रकार वनशिखा को अपनी ही बच्ची का प्यार भी नहीं मिल रहा था । शुदिप्त ने अरुंधती नामक महिला से शादी कर ली और उसका व्यवहार भी वनशिखा के प्रति वैसा ही रहा जैसा कि उसके पति शुदिप्त का था । रुद्रप्रसाद के सामने पूरा परिवार एक दूसरे से प्यार करता है और परस्पर ऐसा व्यवहार करता है जैसे कि परिवार के किसी सदस्य के बीच कोई झगड़ा नहीं है । रुद्रप्रसाद यह समझता है कि उसका परिवार पूरी तरह सुखी परिवार है तथा उसके पुत्रों या पुत्र वधुओं के बीच कोई झगड़ा नहीं है ।

 

       कहानी रुद्रप्रसाद या जिसे प्यार से सभी बाबा कहते हैं से शुरु होती है जो अपना 75वां जन्मदिन मना रहा है । वह अपने परिवार से इतना अधिक खुश है कि वह अपने जन्मदिन पर उन्हें सरपराइज गिफ्ट देना चहाता है । वह उन्हें अपनी वसीयत दिखाने की योजना बनाता है जिससे परिवार का प्रत्येक सदस्य यह जान सके की उसे क्या मिलने जा रहा है । रुद्रप्रसाद अपने परिवार के सदस्यों द्वारा दिये गए प्यार और स्नेह के लिए अपने आप को उनका अभारी समझता है तथा इसलिए प्रत्येक को अपनी सम्पति में से बराबर हिस्सा देकर उस ऋण को कुछ हल्का करना चहाता है । लेकिन जब वह अपनी वसीयत को प्रकट करने वाला ही होता है तभी संयोग से उसे परिवार के कुछ सदस्यों द्वारा उसके संबंध में की जा रही बातें सुनाई पड़ जाती हैं और वह यह जान लेता है कि उसके परिवार के सदस्यों द्वारा उसके प्रति प्यार और सम्मान महज एक ढोंग है । वास्तव में वे उसकी संम्पति में से अपना हिस्सा लेने के लिए उसकी मौत को इंतजार कर रहे हैं । रुद्रप्रसाद के मन में सुखी परिवार की तस्वीर टूट जाती है और उसका दिल टूट जाता है । वह दिमागी रूप से और भावनात्मक रूप से इतना आहत होता है कि दिल का घातक दौरा पड़ने से वह गिर पड़ता है । उसे तत्काल अस्पताल ले जाया जाता है । रुद्रप्रसाद अस्पताल में है और दिल के दौरे से उबर रहा है । वनशिखा उसके पास बैठी हुई है । यहां रुद्रप्रसाद वनशिखा को अपने दिल की बात बता देता है क्योंकि वह यह समझ चुका होता है कि केवल परिवार की वही एक सदस्य है जिसने उसे वास्तव में सहज प्यार और सम्मान दिया है । वह वनशिखा से उसके अतीत के बारे में बात करता है कि उसने केवल 16 वर्ष की आयु में ही कैसे उसके घर और परिवार की जिम्मेदारी संभाल ली थी । वह उसके सुकर्मों के लिए उसे धन्यवाद देता है क्योंकि वह जानता है कि उसने किसी से बिना किसी अपेक्षा के बनर्जी परिवार के लिए पूरा जीवन बलिदान कर दिया है । इसके अलावा वह उसके परिवार द्वारा वनशिखा को दिये गए कष्टों, घृणा और उनकी कृतघ्नता के लिए उससे क्षमा याचना करता है । उसके वचन वनशिखा के दिल को छू जाते हैं और वह उसे शांत करने की कोशिश करती है । वह उसे बातें न करने और आराम करने के लिए कहती है । इसके बाद जब वह थोड़ा शान्त हो जाता है तब वनशिखा रुद्रप्रसाद के लिए पानी लेने कमरे से बाहर चली जाती है ।  इस बीच जब रुद्रप्रसाद कमरे में अकेला होता है तब एक रहस्यमय अनजान व्यक्ति कमरे में प्रवेश करता है और रुद्रप्रसाद की आईवी मशीन के साथ छेड़छाड़ करता है और वनशिखा के आने से पहले ही चुपके से कमरे से बाहर निकल जाता है । अचानक रुद्रप्रसाद बैचेन हो जाता है और उसका स्वास्थ्य बिगड़ जाता है । डॉक्टर उसकी ओर दोड़ते हैं और उसे बचाने का प्रयास करते हैं लेकिन रुद्रप्रसाद की मृत्यु हो जाती है ।

 

अब वनशिखा क्या करेगी? अब रुद्रप्रसाद की सम्पत्ति का क्या होगा? क्या कभी रक्तिमा अपनी मां के त्याग को समझ पाएगी और उसे माफ कर देगी । क्या वनशिखा बनर्जी के परिवार का प्यार और सम्मान प्राप्त कर सकेगी और इस सब के अलावा क्या वनशिखा रुद्रप्रसाद के आदर्श परिवार के सपने को पूरा कर पाएगी .......

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