दूरदर्शन के संबंध में केन्द्रीय सूचना आयोग की प्रथम वार्षिक रिपोर्ट के लिए साम्रगी
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क |
प्रत्येक अधिकारी (प्रसार भारती - दूरदर्शन) द्वारा प्राप्त अनुरोधों की संख्या |
41 |
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ख |
ऐसे निर्णयों की संख्या जिनमें अनुरोधों के अनुसरण में आवेदक दस्तावेजों को प्राप्त करने के हकदार नहीं थे, अधिनियम के प्रावधान जिनके तहत ये निर्णय लिए गए थे तथा इन प्रावधानों के तहत कितनी बार प्रार्थना की गई थी । |
शून्य |
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ग |
पुनरीक्षा के लिए केंद्रीय सूचना आयोग को भेजी अपीलों की संख्या, अपीलों का स्वरूप और अपीलों का परिणाम |
शून्य |
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घ |
इस नियम के प्रशासन के संबंध में किसी अधिकारी के विरुद्ध की गई अनुशासनिक कार्रवाई का ब्यौरा |
शून्य |
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ङ |
इस अधिनियम के तहत प्रत्येक सरकारी प्राधिकारी द्वारा संग्रहित प्रभारों की राशि |
2054/- रुपए |
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च |
इसकी भावना को संचालित और कार्यान्वित करने के लिए सरकारी प्रधिकारियों द्वारा किए गए प्रयासों का उल्लेख करते हुए ब्यौरा दें |
अधिनियम की धारा 4(1)(ख) के अनुसार निर्धारित समय के अन्दर दूरदर्शन द्वारा अपेक्षित मैनुअल प्रकाशित कर दिए गए थे। दूरदर्शन की सरकारी वेबसाइट (www.ddindia.gov.in) में अपनी ओर से निम्नलिखित जानकारी दी गई है :-
1. प्रायोजित कार्यक्रमों का ब्यौरा
2. भुगतान पूरकर्ताओं की सूची
3. तकनीकी सुविधाओं, समाचारों और आर्काइवल का रेट कार्ड
4. निविदा सूचनाएं
5. कार्यक्रम के प्रस्ताव आमंत्रित करना
6. रोजगार के अवसर
7. अधिनियम और दिशा-निर्देश
8. सिटीजन चार्टर
9. टेम रेटिंग
10. प्रमुख आगामी कार्यक्रमों के बारे में सूचना:
सभी अधिकारियों को वेबसाइट को नियमित अन्तराल पर अद्यतन करते रहने के अनुदेश जारी कर दिए गए हैं । निम्नलिखित के संबंध में वेबसाइट पर ब्यौरा लोड करने और नियमित अन्तराल पर उसे अद्यतन करने के प्रयास किए जा रहे हैं :-
1. कमीशंड और प्रायोजित कार्यक्रमों के आवेदनपत्रों पर कार्रवाई ।
2. विज्ञापनों के बिल भेजने से संबंधित कार्यकलाप ।
3. उपस्करों और सामग्रियों की खरीद/प्रापण ।
4. स्थानान्तरण/तैनाती |
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छ. |
अधिनियम के विकास, सुधार, आधुनिकीकरण, सुधार के लिए संशोधन करने, या सूचना प्राप्त करने के अधिकार को प्रचालन में लाने के लिए किसी अन्य विधान या सामान्य नियम या अन्य सुसंगत मामलों सहित सुधार के लिए उपयुक्त सुझाव । |
अधिनियम के कार्यान्वयन में निहित मामलों की जांच करने के लिए बनाई गई प्रशासनिक सुधार आयोग की प्रश्नावली के उत्तर में इस महानिदेशालय द्वारा कई सुझाव दिए गए थे । प्रश्नावली का उत्तर इस महानिदेशालय की अ.वि. टिप्पणी सं. 904/49/2005-स्कोर,दिनांक 16.05.2006 के द्वारा मंत्रालय को भेजा दिया गया था । इसकी प्रति संलग्न है । प्रमुख सुझावों का उल्लेख अनुलग्नक - क में किया गया है । विगत में इस महानिदेशालय को हुए अनुभव के आधार पर एक और सुझाव दिया जा रहा है । यह सुझाव अनुलग्नक - ख में दिया गया है । |
अनुलग्नक-क
सुझाव-1 अधिनियम को कार्यान्वित करने के लिए सरकार द्वारा अतिरिक्त निधियां आबंटित किए जाने की आवश्यकता
सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत सूचना प्राप्त करने की मांग समय के साथ-साथ बढ़ने की संभावना है । कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग द्वारा निर्धारित आवेदन शुल्क आदि सूचना उपलब्ध कराने में निहित लागत को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है । इसलिए यदि सरकार इस प्रयोजन के लिए विशेष निधियां आवंटित करे, विशेष रूप से स्वायत्तशासी संगठनों के मामले में, तो यह उचित होगा ।
सुझाव-2 : अधिनियम को कार्यान्वित करने के लिए सरकार द्वारा अतिरिक्त पद संस्वीकृत किए जाने की आवश्यकता
सूचना प्राप्त करने की प्रत्याशित मांग को पूरा करने के लिए सभी स्तरों पर वर्तमान स्टाफ पर्याप्त नहीं होगा क्योंकि अधिनियम में निधार्रित समय सीमा पीआईओ के लिए व्यावहारिक कठिनाई है । इसके अतिरिक्त, समय सीमा का पालन न करने पर पीआईओ को दंड देना पड़ सकता है जो 25,000/-रुपए तक का हो सकता है । पीआईओ को अपने सामान्य कार्य के अतिरिक्त अधिनियम के तहत मांगी गई सूचना उपलब्ध करानी होती है । सामान्य कार्य में कार्य की ऐसी अनेक मदें शामिल होती हैं जिन्हें संगठन के सर्वाधिक हित में पीआईओ को पूरा करना होता है । वर्तमान कर्मचारी संगठन के हित का उस समय समुचित ध्यान नहीं रख पाएंगे जब दंड से बचने के लिए वे संगठन के अन्य कार्यों की बजाए अधिनियम के तहत प्राप्त आवेदनपत्रों को प्राथमिकता देंगे । आरटीआई अधिनियम से संबंधित कार्य और सामान्य कार्य के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए अतिरिक्त स्टाफ की आवश्यकता होगी । दूरदर्शन जैसे संगठन के मामले में यह बहुत अधिक महत्वपूर्ण है, जो इसकी संस्वीकृत कर्मचारियों की तुलना में कम कर्मचारियों के साथ कार्य कर रहा है और अतिरिक्त कर्मचारियों की स्वीकृति के बिना नई परियोजनाएं भी चालू की जा रही हैं ।
सुझाव - 3 अधिनियम को समुचित रूप से लागू करने के लिए कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग द्वारा प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाने की आवश्यकता
अधिनियम में सूचना देने के लिए व्यापक दिशा-निर्देशों का उल्लेख किया गया है । अत: यह सुनिश्चित करने के लिए कि संबंधित अधिकारी उनका समुचित रूप से अनुपालन करें कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग को नोडल विभाग होने के नाते प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित पर विचार करना चाहिए । विभिन्न मंत्रालयों/विभागों द्वारा प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाने से संकल्पना में एकरूपता नहीं रहेगी ।
सुझाव-4 : सूचना के लिए सारहीन (नगण्य) अनुरोधों को रोकने के लिए तंत्र तैयार करने की आवश्यकता
सूचना की सारहीन मांगों पर कार्रवाई करना अत्यधिक आवश्यक है क्योंकि अन्यथा इससे आरटीआई अधिनियम का दुरुपयोग होगा तथा वह उद्देश्य प्राप्त नहीं किया जा सकेगा जिसके लिए इसे अधिनियमित किया गया है । इस संबंध में निम्नलिखित सुझाव दिए जाते हैं :-
- सभी मंत्रालयों/विभागों से सुझाव मांगने के बाद कार्मिक और प्रशिक्षण द्वारा दिशा-निर्देश जारी किए जाने चाहिएं कि सूचना की सारहीन मांग में किसे शामिल किया जाएगा ।
- उक्त विभाग द्वारा इस आशय के आदेश जारी किए जाएं कि सूचना की सारहीन मांग पर केवल यह कार्रवाई करनी होगी कि आवेदक को यह सूचित कर दिया जाए कि सूचना के लिए उसकी मांग सारहीन है ।
- यदि उक्त आवेदक सूचना के लिए अपनी मांग को अस्वीकार किए जाने के विरुद्ध अपील करता है और अपील खारिज कर दी जाती है तो अधिनियम में उसे दंड दिए जाने की व्यवस्था होनी चाहिए ।
- दंड देने के लिए सक्षम प्राधिकारी आयोग होना चाहिए तथा यह दंड उतना ही कठोर होना चाहिए जितना वर्तमान में उस पीआईओ के लिए है जो ऐसी सूचना नहीं देता है या सूचना विलम्ब से देता है, जो अधिनियम द्वारा निषेध नहीं है ।
अनुलग्नक - ख
सुझाव : इस प्रकार के मामलों में जिनका नीचे उल्लेख किया गया है, अधिनियम के दुरुपयोग को रोकने की आवश्यकता
अधिनियम के तहत, कई व्यक्ति एक ही आवेदन में अनेक मुद्दों के संबंध में सूचना मांगते हैं । उदाहरण के लिए, दूरदर्शन में किसी व्यक्ति ने लगभग ऐसे 32 बिंदुओं के बारे में सूचना मांगी जो एक से अधिक कार्यालयों से संबंधित थी । उसी व्यक्ति ने इसके साथ-साथ एक और आवेदनपत्र प्रस्तुत कर दिया जिसमें 22 बिंदुओं के बारे में सूचना मांगी गई थी । इन दो आवेदनपत्रों में मांगी गई सूचना उस सूचना के अलावा थी जो उसने 15 दिन पहले दिए गए अन्य 4 आवेदनपत्रों में मांगी थी । इसके फलस्वरूप उस अधिकारी का कार्य अनावश्यक रूप से बढ़ गया जबकि उसके पास पहले ही बहुत अधिक काम था ।
2. एक अन्य मामले में, एक व्यक्ति ने इस महानिदेशालय के संबंधित पीआईओ से भारी भरकम आंकड़े मांग लिए । इन भारी भरकम आंकड़ों को निर्धारित समय-सीमा के अन्दर संकलित करने के लिए संबंधित अधिकारी और कर्मचारियों को अवकाश के दिन भी कार्यालय आना पड़ा । इन आंकड़ों को समाहित करने में 2661 पृष्ठ, 39 फ्लॉपी और एक सीडी लगी । उस व्यक्ति से कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग द्वारा निर्धारित मापदंड के अनुसार इसके लिए 7,372/- रुपए जमा कराने के लिए अनुरोध किया । आरंभ में उसने कोई उत्तर नहीं दिया । परंतु बाद में उसने यह तर्क दिया कि 10/- रुपए के आवेदन शुल्क में समस्त लागत शामिल हो जाती है, इसलिए उसे कुछ भुगतान नहीं करना है । हालांकि यह महानिदेशालय उसे सही स्थिति स्पष्ट करेगा परंतु इस बात में संदेह है कि वह अपेक्षित राशि का भुगतान करके उसके अनुरोध पर विशेष रूप से तैयार किए गए पृष्ठों, फ्लॉपियों और सीडी को प्राप्त करेगा ।
3. अनेक आवेदक अधिनियम का उपयोग शुद्ध सूचना प्राप्त करने के लिए नहीं करते हैं, बल्कि कुछ अन्य अधिकारियों की कार्रवाइयों/निर्णयों के बारे में, जो सामान्यत: उसके वरिष्ठ अधिकारी होते हैं, पीआईओ के विचार, नियमों की व्याख्या तथा पीआईओ का निर्णय जानना चाहते हैं । दंड के प्रावधान के कारण पीआईओ में व्याप्त भय की मनोवृत्ति की वजह से पीआईओ को इस प्रकार के प्रश्नों के उत्तर भी देने पड़ते हैं । परंतु यह उचित नहीं है । किसी भी व्यक्ति को पीआईओ के विचार/निर्णय/अर्थ की व्याख्या मांगने की स्वतंत्रता नहीं दी जानी चाहिए । पीआईओ सामान्यत: संबंधित नियमों पर अथवा वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा लिए गए निर्णयों/की गई कार्रवाइयों पर विचार देने के लिए इतना बड़ा अधिकारी नहीं होता है । आवेदकों को संबंधित नियमों, आदेशों आदि की प्रतियां मांगने की स्वतंत्रता है परंतु जहां तक किसी निर्णय/कार्रवाई के औचित्य अथवा नियमों आदि की व्याख्या का संबंध है, यदि वे संबंधित अधिकारी के निर्णय/कार्रवाई से संतुष्ट नहीं होते हैं तो उन्हें अपने विचार स्वयं बनाने चाहिएं तथा उसके लिए प्रशासनिक/विधिक उपाय करने चाहिएं ।
4. जहां ऊपर पैरा 1 और 3 में उल्लिखित किस्म के आवेदनपत्रों को अस्वीकार करने के स्पष्ट निदेश होने चाहिएं वहीं ऊपर पैरा 2 में उल्लिखित किस्म के मामलों में दंड देने का प्रावधान भी होना चाहिए ।
रिपोर्ट में उल्लिखित प्रश्नावली का उत्तर
प्रसार भारती
(भारतीय प्रसारण निगम)
दूरदर्शन महानिदेशालय
विषय : सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 का कार्यान्वयन - तत्संबंधी प्रश्नावली ।
उपर्युक्त विषय पर मंत्रालय अपनी अ.वि.सं. 1601/3/06-बीए(ई) दिनांक 21.02.2006 का अवलोकन करें ।
2. प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा वांछित प्रश्नावली के विभिन्न प्रश्नों के बारे में दूरदर्शन के उत्तर अनुलग्नक में दिए गए हैं ।
इसे अपर महानिदेशक (प्रशा.एंव वित्त) के अनुमोदन से जारी किया जाता है ।
(विनोद कुमार शर्मा)
उप निदे